जैसे ही उस दिन आँखें बंद कीं ,
यूँ ही अचानक् दादी माँ की याद आ गयी,
अभी बस होली गुजरी ही तो थी,
वही उनके साथ गाँव की हर शाम याद आ गयी ||

गर्मियों की छुट्टियाँ होते ही हर साल ,
गाँव भाग जाया करती थी मैं ,
दूर गली से मेरा इन्तेज़ार करती ,
उनकी आँखों की मुस्कान याद आ गयी  ||

हर दिन को उनके  हाथ का खाना ,
जो सबसे पहले खाया करती थी मैं ,
हर रात में मेरे लिए बिछाती थी जो ,
वो एक छोटी सी स्पेशल खाट याद आ गयी  ||

ताश में काट्बोल खेलते हुए हार जाने पर,
उन्हें अक्सर चिढाया करती थी मैं ,
पर हारने से पहले ही cheating कर
उनकी पत्ते मिला देने की बात याद आ गयी ||

दिवाली के दिन जब पूरा परिवार साथ,
आँगन मैं बैठा होता था ,देखती थी मैं ,
भगवान् को शुक्रिया करती वो गर्वित हो ,
उनकी पूजा की खामोश फरियाद याद आ गयी ||

आँखें खोली मैंने तो कुछ उस दिन,
पानी सा भर आया था इनमे ,
आखरी बार जब देखा था उन्हें ,
उस कोमल से स्पर्श की अंतिम सौगात याद आ गयी ||

यूँ ही अचानक् दादी माँ की याद आ गयी||

P.S- I wasn’t very sure if I  wanted to post this one, but since I was eager to get back to blogging but could not come up with anything to write on, and this one came just so naturally, so without thinking further i just posted.